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माँ बाप के झगड़े मे बच्चे की ज़िम्मेदारी किसकी।



क्या यह दूरी कुछ दिनों की है या अब माता-पिता का मिलना असंभव है कुछ मूलभूत कमियों की वजह से उन्हें अलग होना ही पड़े तो ज्योतिष में बच्चे की कुंडली से यह देखा जा सकता है की बच्चे की कस्टडी किसको मिलेगी आज हम इसी पर बात करेंगे।

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सनातन धर्म की प्रथा

 दोस्तों  सनातन धर्म की एक प्रथा रही है कि सात जन्मों का बंधन, किंतु आज के भागदौड़ के जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि, संबंध कच्चे धागे से बंधे होने की वजह से कब टूट जाते हैं इसका पता भी नहीं चलता है, और कुछ ऐसे संबंध जुड़ जाते हैं जिसे समाज मान्यता नहीं देती। ऐसी स्थिति में पति पत्नी का अलग होना बहुत कॉमन सी बात है। ऐसी स्थिति में बच्चे सरवाइव कर जाते हैं, उन्हें यह नहीं समझ में आता कि वह मां का साथ पकड़े या पिता का। ऐसी स्थिति में मां और पिता बच्चों के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं।
 ज्योतिष में इस विषय को बड़ा गंभीरता से लिया जाता है और ऐसी स्थिति परिस्थिति से निपटने के लिए यह भी देखा जाता है कि क्या यह दूरी कुछ दिनों की है या अब माता-पिता का मिलना असंभव है, यदि यह दूरी कुछ दिनों की है तो माता-पिता को यह समझाया जा सकता है कि कुछ दिनों के बाद आपके प्रेम में बढ़ोतरी हो जाएगी और ऐसी सभी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
         किंतु कुछ परिस्थितियों में ऐसी स्थिति दिखने लगती है कि जब मां और पिता एक ना हो पाए और कुछ मूलभूत कमियों की वजह से उन्हें अलग होना ही पड़े तो ज्योतिष में बच्चे की कुंडली से यह देखा जा सकता है की बच्चे की कस्टडी किसको मिलेगी आज हम इसी पर बात करेंगे।
        बच्चे मां बाप का अंश होते हैं उनका बचपना दोनों की गोद में बीतता है, इसलिए बच्चे से दोनों को एक अटूट लगाव होता है जिस कारण से मां या पिता दोनों ही बच्चे से दूर नहीं होना चाहते और दोनों ही उसे प्राप्त करना चाहते हैं किंतु ऐसा संभव नहीं है, यदि मां-बाप अलग हो रहे हो तो इसलिए मां या पिता दोनों में से किसी एक को बच्चे की कस्टडी मिलेगी और दूसरे को कुछ थोड़े बहुत अधिकार। 
        तो चलिए शुरू करते हैं।  इसमें पहले हम बात करते हैं family law  की-

family law

त्याग २ वर्ष, निर्दयता (शारीरिक एवं मानसिक), कुष्ट रोग (१ वर्ष), रतिजरोग (३ वर्ष), विकृतिमन (२ वर्ष) तथा परपुरुष अथवा पर-स्त्री-गमन (एक बार में भी) अधिनियम की धारा १३ के अनुसार - संसर्ग, धर्मपरिवर्तन, पागलपन (३ वर्ष), कुष्ट रोग (३ वर्ष), रतिज रोग (३ वर्ष), संन्यास, मृत्यु निष्कर्ष (७ वर्ष), पर नैयायिक पृथक्करण की डिक्री पास होने के दो वर्ष बाद तथा दांपत्याधिकार प्रदान करनेवाली डिक्री पास होने के दो साल बाद 'संबंधविच्छेद' प्राप्त हो सकता है।
स्त्रियों को निम्न आधारों पर भी संबंधविच्छेद प्राप्त हो सकता है; यथा-द्विविवाह, बलात्कार, पुंमैथुन तथा पशुमैथुन। धारा ११ एवं १२ के अंतर्गत न्यायालय 'विवाहशून्यता' की घोषणा कर सकता है। विवाह प्रवृत्तिहीन घोषित किया जा सकता है, यदि दूसरा विवाह सपिंड और निषिद्ध गोत्र में किया गया हो (धारा ११)।
नपुंसकता, पागलपन, मानसिक दुर्बलता, छल एवं कपट से अनुमति प्राप्त करने पर या पत्नी के अन्य पुरुष से (जो उसका पति नहीं है) गर्भवती होने पर विवाह विवर्ज्य घोषित हो सकता है। (धारा १२)।
अधिनियम द्वारा अब हिंदू विवाह प्रणाली में निम्नांकित परिवर्तन किए गए हैं :
उपरोक्त सामग्री( family law)  विकिपीडिया से लिया गया है जिसका लिंक संलग्न है 

who will custody or child custody


दोस्तों बात करते हैं ज्योतिष की ज्योतिष से कस्टडी देखने के लिए हमें बच्चों की kundali-पत्री देखना होगा एक ज्योतिषी ज्योतिष के 12 हाउस को देख कर के ही यह निर्णय कर सकता है child custody किस को मिल सकती है। यदि मां की दिमागी हालत ठीक हो और मां के पास इतने पैसे हो, कि वह  बच्चे का पालन पोषण कर सके, तो चतुर्थ भाव को देखा जाता है यदि चतुर्थ भाव बली हो शुभ ग्रहों से युक्त हो अपने नक्षत्र या उप नक्षत्र में चतुर्थ भाव या चतुर्थ भाव के साथ अष्टम भाव जोकि ज्योतिष में लीगेसी या पॆत्रक भाव होता है, यदि यह  उस वक्त बली हो और ग्रह दशा अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा में यह भाव शामिल हो या उन दशाओं के नक्षत्र या उप नक्षत्र में शामिल हो, तो निश्चिंत ही माता को कस्टडी प्राप्त होगी

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यदि अष्टम भाव का प्रदर्शन बच्चे की कुंडली में कमजोर हो किंतु चतुर्थ भाव इंवॉल्व  अधिक हो तो भी माता को ही कस्टडी मिलेगी इस केस मा ही जीतेगी।
 किंतु यदि नवम भाव मजबूत हो बली हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या नक्षत्र उप नक्षत्र में आ रहा हो तो ऐसी स्थिति में बच्चे के हकदार पिता होंगे नवम भाव पिता का भाव होता है इसलिए इस भाव के बली होने पर कस्टडी पिता को मिलेगी।

 अक्सर ऐसा देखा गया है की मां और पिता दोनों को child custody नाम मिलकर के  कोर्ट कुछ ऐसे ऐतिहासिक फैसले कर देती है जिससे माता पिता को बच्चे की कस्टडी ना मिल कर के अन्य किसी को मिल जाती है, ऐसी स्थिति में एक ज्योतिषी तीसरे भाव और आठवें भाव को विशेष रूप से देखता है यदि बालक के तीसरा भाव और आठवां भाव दोनों प्रबल रूप से नक्षत्र और उप नक्षत्र को दर्शाते हैं तो ऐसी स्थिति में मां बाप के अलावा कस्टडी किसी अन्य को चली जाती है बच्चे का पालन पोषण वही करता है किंतु कानून के अनुसार मां बाप को उससे मिलने की इजाजत नियम व शर्तों के आधार पर दी जा सकती है।

dual legacy

किसी बच्चे की जन्म कुंडली देखकर यह जरूर पता लगाया जा सकता है कि बच्चा अडॉप्टेड है या नहीं। इसे चेक करने का बहुत ही आसान तरीका है, बच्चे का आठवां भाव। हिंदुस्तान में पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का भी यही भाव होता है legacy का हाउस होने की वजह से एडॉप्शन भी इसी हाउस से देखा जाता है, यदि इस हाउस में dual sign हो तो बच्चे को ड्यूल legacy प्राप्त होती है यदि यह हाउस कमजोर हो, तो उपरोक्त बातें गलत होगी किंतु यदि यह हाउस मजबूत हो और साथ में दो प्लेनेट इस भाव में बैठे हो और एक दूसरे को सपोर्ट कर रहे हो तो भी बच्चे को ड्यूल ले गए सी प्राप्त होती है। एक शर्त और है यदि यहां पर दो प्लेनेट इस हाउस को एक ही कैटेगरी के देख ले, या अपनी दृष्टि डालें उनमें से एक की दशा या अंतर्दशा चल रही हो तो ऐसी स्थिति में भी dual legacy प्राप्त होती है या फिर बुध इस हाउस में अकेले ही बैठे हो तो भी बालक को dual legacy  दिलाते हैं 

 यदि इस हाउस में अकेले गुरु भी बैठे हो तो भी dual legacy दिलाते हैं यदि गुरु बैठे होंगे तो लीगेसी मिलने में थोड़ा समय लगेगा कहने का मतलब है की जीवन के दूसरी अवस्था में यानी युवावस्था में  या प्रौढ़ावस्था old age  में legacy प्राप्त होती है।

 किंतु यदि बुध के बैठने पर dual legacy बाल्यावस्था मैं ही प्राप्त हो जाती है। यह ग्रहों का अपना नेचर होता है इसलिए उनके अनुसार  ही हमें उनका फल भी प्राप्त होता है। एक कुशल ज्योतिषी इन सब बातों की गणना करके इन सब बातों पर विचार करके आपको रिजल्ट देता है 

 legacy प्राप्त करने के कानूनी तौर तरीके

यदि पति पत्नी में तलाक हो जाए तो उसके बाद बच्चे की कस्टडी माता को मिलेगी या पिता को मिलेगी कानून में इसके लिए बहुत से प्रावधान है जिनमें से कुछ की चर्चा कर रहा हूं, बाकी कानूनी विषय अलग है  यह हमारा विषय नहीं इसलिए हम जो भी समाधान निकालते हैं वह ज्योतिष के अनुसार इसलिए संक्षिप्त में वर्णन आपके  हेल्प के लिए है।

divorce child custody in india

कानूनों के तहत divorce child custody in india के चार मूल प्रकार हैं
Sole Physical Custody; बच्चा अगर अपने मां-बाप के साथ समय बिताएं तो शारीरिक सुरक्षा उसे प्रदान होती है इसलिए माता या पिता ऐसी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं अन्य दूसरे की अपेक्षा।
Joint Physical Custody: संयुक्त शारीरिक अभिरक्षा का अर्थ है कि माता-पिता में से प्रत्येक के पास शारीरिक अभिरक्षा के महत्वपूर्ण काल ​​होंगे। दूसरे शब्दों में, माता-पिता दोनों का बच्चों के साथ कम या ज्यादा संपर्क जारी रहेगा।
Sole Legal Custody: एकमात्र कानूनी हिरासत का मतलब है कि एक माता-पिता के पास बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण के बारे में निर्णय लेने का अधिकार और जिम्मेदारी होगी। अन्य माता-पिता मुलाक़ात के अधिकारों को बनाए रखते हैं। हालाँकि अदालतें संयुक्त कानूनी हिरासत का पक्ष लेती हैं, एकमात्र कानूनी हिरासत सबसे आम हिरासत व्यवस्था है।
Joint Legal Custody: संयुक्त कानूनी हिरासत का मतलब है कि माता-पिता दोनों बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण के बारे में निर्णय लेने का अधिकार और जिम्मेदारी साझा करते हैं। कानून मानता है कि संयुक्त कानूनी हिरासत नाबालिग बच्चों के सर्वोत्तम हित में है, जब माता-पिता इसे काम कर सकते हैं और एक व्यावहारिक माता-पिता की योजना प्रस्तुत कर सकते हैं। " हालांकि, संयुक्त कानूनी हिरासत हमेशा आसान नहीं होती है। इसमें माता-पिता दोनों को सहयोग करने और सभी मतभेदों को अलग रखने की आवश्यकता है।
दोस्तो समुद्र की गहराई जिस प्रकार से नापना मुम्किन नही थीक इसी प्रकार से एक पेज मे सारी जांकारि दे पाना मुम्किन नही । आप को ये जांकरि कैसी लगी हमे अवश्य बताइये ।

 Contact  

                                                         धन्यवाद  
                                                  दोस्तों मैं आपका  दोस्त
                                                  एस्ट्रोलॉजर वास्तु शास्त्री

saral upay 11 points


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Sarvesh Astrologer Vastushastri

Astro Vastu Sarvesh (AVS) का उद्देश्य लगो की जनम कुंडली से निकलने वाली ऊर्जा और उस व्यक्ति के मकान से निकलने वाली ऊर्जा के बीच तालमेल बैठाना ही है, ताकि वो व्यक्ति मकान के बजाय "सुख और समृद्ध घर" मे रहे। इंसान के सोच से कर्म का निर्माण होता है, और कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है, AVS आपके कर्म को जागृत करते है और आप अपने भाग्य को।

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