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shubh muhurat 5 points panchang | हर शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता | necessary of muhurat

shubh muhurat 5 points panchang | हर शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता | necessary of muhurat



shubh muhurat 5 points panchang 



astrovastusarvesh के इस पेज मे  मुहूर्त की आवश्यकता क्यों, मुहूर्त का अर्थ, मुहूर्त के लिए पंचांग का महत्व, नक्षत्र का मुहूर्त से संबंध, हर शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता क्यों, ग्रह प्रवेश मुहूर्त, विवाह मुहूर्त, यात्रा का मुहूर्त, अन्य जगह जहां मुहूर्त की आवश्यकता होती है मुहूर्त के विषय में आज इन  बातों पर चर्चा होगी:-
 तो शुरू करते हैं

मुहूर्त की आवश्यकता क्यों necessary of muhurat


नमस्कार दोस्तों किसी खास समय में किसी खास ऊर्जा का उत्पन्न होना दर्शाता है कि, वह समय हमारे लिए ऐसा समय है कि जब हम किसी कार्य को करते हैं तो वह ऊर्जा उस कार्य को करने में हमारी मदद करती है। जिस प्रकार से दिन में हमें दिखाई देता है किंतु रात में हमें रोशनी की जरूरत होती है तभी हम देख सकते हैं इसलिए हम अपने दिनचर्या का कार्य सूर्य के उदय होने के उपरांत ही करते हैं, इसी प्रकार से सोने का एक निश्चित समय है रात्रि का समय होता है। बिल्कुल इसी प्रकार से मुहूर्त भी अपना कार्य करता है।
इसे संक्षेप में कहें तो संपूर्ण तिथि का वह अंश मात्र समय जो उस कार्य के लिए सबसे ऊर्जन्वित  समय होता है जिस कार्य के लिए हम मुहूर्त निकालते हैं। समय जल के समान निरंतर बहने वाली धारा है, जिस प्रकार से पृथ्वी का घूमना, हृदय का धड़कना, सांसो का लेना अत्यंत आवश्यक है उसी प्रकार से समय का निरंतर चलना भी अत्यंत आवश्यक है।

मुहूर्त का अर्थ क्या है


घटनाएं दो प्रकार की होती है, शुभ या अशुभ। शुभ घटनाओं से हमें जो परिणाम प्राप्त होते हैं वह शुभ होते हैं, और अशुभ घटनाओं से जो परिणाम हमें प्राप्त होते हैं वह अशुभ होते हैं। शुभ घटनाओं से प्राप्त फल हमें एक नई ऊर्जा के साथ ऊर्जन्वित करते हैं और अशुभ घटनाओं से प्राप्त होने वाले फल हमेशा दुख कष्ट आदि देते हैं। मुहूर्त की आवश्यकता को ज्योतिष और वास्तु  दोनों में ही अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना गया है अतः मुहूर्त का अर्थ दो घटी अर्थात48 मिनट का समय होता है। अब आपके मन में यह प्रश्न आएगा समय क्या होता है तो मित्रों जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है किस समय निरंतर बहने वाले पलों और घटी का एक निश्चित सिलसिला होता है इसे विस्तार से समझे तो समय के उस क्षण विशेष से मुहूर्त का मतलब होता है जो 7 ग्रहों की स्थिति विशेष के प्रभाव के कारण किसी भी कार्य प्रक्रिया अथवा जीवन के प्रारंभ होने के लिए कुछ  शुभ संभावनाएं रखता है। मुहूर्त में सूर्य और चंद्रमा सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं मुहूर्त के विभिन्न घटक जैसे नक्षत्र, तिथि, वार, योग, करण, लग्न, आदि सभी अलग अलग एवं एक दूसरे के संबंध में भी सूर्य एवं चंद्रमा की गति पर आधारित होता है

मुहूर्त की उपयोगिता क्या है


किसी विशेष समय में जन्म लेने  या  कार्य को अंजाम देने के कारण उस व्यक्ति विशेष का  प्रारब्ध निश्चित हो जाता है। जिसके द्वारा जातक स्वयं को समय के अनुकूल बनाता है और नैसर्गिक बल के विरुद्ध जाने की अपेक्षा किसी कार्य की शुरुआत तब की जाए जब अलौकिक शक्ति अनुकूल हो, जिससे व्यक्ति विशेष को शुभ लाभ मिल सके। दूसरी भाषा में किसी तेज धार से बहती हुई नदी के धार के साथ बहना शुभ मुहूर्त होता है, और नदी के धार के विपरीत बहना अशुभ मुहूर्त कहा जा सकता है।

पंचांग का मुहूर्त में महत्व


पंचांग "panchang" से अभिप्राय है 5 अंग अर्थात तिथि, नक्षत्र, वार, योग, तथा करण, और ग्रहों में सूर्य और चंद्रमा जिनसे हमारा लग्न बनता है, और यह विभिन्न स्थितियों और युवतियों के द्वारा किसी भी कार्य विशेष के लिए शुभ अथवा अशुभ स्थिति का निर्माण करते हैं। हर मनुष्य कर्म करने के लिए ही उत्पन्न हुआ है। श्री कृष्ण ने गीता में कर्म के लिए व्यक्ति को जन्म लेने का कारण बताया है। अतः हर व्यक्ति को निरंतर कर्म करना चाहिए, संपूर्ण सृष्टि का आधार यही कर्म ही है। ईश्वर भी अपना आशीर्वाद तभी देते हैं जब व्यक्ति अपनी पूरी निष्ठा लगन और मेहनत से अपना कर्म करता है। और किसी कार्य को अच्छे समय पर प्रारंभ करके उसका शुभ फल प्राप्त करता है। मुहूर्त व्यक्ति के जन्म कुंडली के आधार पर ही निकाला जाता है। 

पंचांग की तिथि से अभिप्राय


तिथि से अभिप्राय है कि चंद्रमा और सूर्य की 12 अंश के अंतराल को एक तिथि के रूप में मानते हैं। मुहूर्त और सारा ज्योतिष और सारे त्यौहार इन्हीं तिथियों के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं। अर्थात् सूर्योदय के समय जो तिथि होती है वहीं उस तिथि के रूप में हम मानते हैं और जब सूर्य और चंद्रमा एक ही डिग्री पर आ जाते हैं तो अमावस्या होती है और सूर्य और चंद्रमा जब 180 डिग्री पर होते हैं तो पूर्णमासी होती है। एक माह में 30 तिथियां होती हैं जिनमें से 15 तिथियां शुक्ल पक्ष में आती हैं और 15 तिथियां कृष्ण पक्ष में आती हैं। सूर्य और चंद्रमा की निश्चित दूरी एक निश्चित कोण बनाती है उनकी कोणीय दूरी को ही एक तिथि का नाम दिया गया है, जो प्रतिपदा से आरंभ हो कर चतुर्दशी और पूर्णिमा को एक समाप्त होता है जिसे शुक्ल पछ कहते है इसी प्रकार से प्रतिपदा से अमावस्या तक का समय कृष्ण पछ का और इस  प्रकार कुल 30 तिथियां होती हैं। जब चंद्रमा सूर्य के नजदीक जाता है तो कृष्ण पक्ष की तिथियां चलती हैं और जब चंद्रमा सूर्य से दूर होने लगता है तो शुक्ल पक्ष की तिथियां चलते हैं। तिथिया एक समूह में होते हैं, जो है- नंदा तिथियां भद्रा तिथियां जया तिथियां रिक्ता तिथियां पूर्णा तिथियां इन्हीं पांच का क्रम हर पांचवी तिथि के बाद पुनः प्रारंभ हो जाता है।

नक्षत्र


हमारे ब्रह्मांड में 16 डिग्री के अंदर सात ग्रह होते हैं, और इनके पीछे तारों का एक पुंज दृष्टिगोचर होता है जो एक निश्चित आकृति बनाते हैं, तारों के समूह को हम नक्षत्र के नाम से जानते हैं। इन्हें 27 भागों में बांटा जाता है जो 27 नक्षत्र के नाम से जाने जाते हैं। हर नक्षत्र का एक निश्चित मान होता है जो 13 डिग्री 20 कला होता है। प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं ,एक चरण का मान 3 अंश 20 कला होता है हमारे ब्रह्मांड का आरंभ मेष राशि के प्रथम बिंदु से होता है और 27 नक्षत्रों का एक सर्किल बनता है और इन्हीं से हमारा लग्न निर्धारित होता है। एक लग्न (2.25) सवा दो नक्षत्र का होता है। जिस लग्न पर चंद्रमा उपस्थित होता है जन्म के समय, वही हमारी राशि कहलाती है। जिसे हम जन्म राशि के नाम से भी जानते हैं। और चंद्र कुंडली के नाम से भी जानते हैं।
इनमें से एक नक्षत्र उत्तराषाढ़ा के अंतिम पद और श्रवण के प्रथम पद  के 4 घटी अभिजीत नक्षत्र कहलाता है
एक माला में 108 मनके होते हैं और 27 नक्षत्र के चार चरण होते हैं, अर्थात 27x4=108, अतः 108 ब्रह्मांड का एक पूरा चक्कर लगाने के समान होता है इसीलिए यह हमारे लिए शुभ होता है और इसी लिए प्रत्येक मंत्र का या जाप का उच्चारण हम एक माला के रूप में करते हैं जिसमें 108 मनके होते हैं।

वार


एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का समय 1 दिन का समय होता है हर दिन को एक ग्रह के प्रारंभ का दिन माना जाता है जिसे वार कहा जाता है। सभी वारो में मंगलवार और शनिवार पूर्ण रूप से अशुभ है तथा रविवार आंशिक रूप से अशुभ है। इन वारों के नाम ग्रहों के आधार पर रखे गए हैं, इसलिए इनका क्रम 7 होता है प्रत्येक वार का अपना विशेष महत्व होता है इसलिए इन वारों में कुछ विशेष कार्य शुभ होते हैं और कुछ कार्य वर्जित होते हैं इसलिए मुहूर्त में वार का अत्यधिक महत्व होता है। हर दिन को 24 होरा में विभक्त करते हैं जिनमें से 12 होरा रात्रि व 12 होरा दिन का होता है दिन में प्रत्येक होरा उस निश्चित वार के स्वामी की ही होती है जैसे रविवार को प्रथम होरा सूर्य देवता की होगी।

योग


सूर्य व चंद्रमा की चाल से जो डिग्री बनती है उसी से योग का निर्माण होता है। योगों की कुल संख्या 27 होती है जो प्रत्येक दिन के सूर्य व चंद्रमा के बीच का योग करके उसे 13 डिग्री 20 कला से भाग देने पर प्राप्त होती है। इन योगों के नाम से ही इनकी प्रकृति भी निर्धारित होती है। इनमें से कुछ योग अशुभ होते हैं जिनमें हम कोई भी शुभ कार्य नहीं करते हैं। इनमें से अमृत सिद्धि योग शुभ कार्य के लिए अत्यंत शुभ होता है इस योग में कोई भी शुभ कार्य सफलतापूर्वक सिद्ध हो जाता है। इस कार्य में विवाह करना, विदेश जाना, धार्मिक अनुष्ठान करना, परीक्षा देना, समझौता करना, किसी कार्य के लिए प्रार्थना पत्र लिखना, खरीद-फरोख्त करना, किसी पर मुकदमा करना भू संपत्ति आदि खरीदना, वाहन खरीदना, नए कपड़े व आभूषण खरीदना आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए जा सकते हैं।

करण


एक तिथि को दो भागों में विभक्त करते हैं एक भाग 1 करण के बराबर होता है अर्थात सामान्य शब्दों में  आधे तिथि को एक करण कहा जाता है हमारे ज्योतिष में कुल 11 करण होते हैं जिनमें से सात करण चर होते हैं और अंतिम चार कारण स्थिर होते हैं।

मास या महीना


मुहूर्त के श्रंखला में मांस का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान होता है। मांस अर्थात 30 दिनों का एक समूह जिसे हम महीने के नाम से भी जानते हैं। हिंदू तिथियों के अनुसार ही 12 मास भी होते हैं अत: सूर्य एक राशि में एक माह तक रहता है। जिस भी राशि में सूर्य प्रवेश करता है, उसी के राशि के नाम से वह मास जाना जाता है जब सूर्य मीन राशि में प्रवेश करता है तो हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह चैत्र मास अर्थात प्रथम मास होता है और जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो माघ का मास प्रारंभ होता है।

चंद्रमास- सनातन धर्म में दो प्रकार के चंद्रमा का प्रयोग होता है। प्रथम चंद्रमास  शुक्लादी एक आमावस या से दूसरी अमावस्या तक और द्वितीय चंद्रमास कृष्ण आदि एक पूर्णमासी से दूसरी पूर्णमासी तक जिसे हम चंद्रमास के नाम से जानते हैं अतः व्रत के प्रारंभ, श्राद्ध, नौ ग्रह निर्माण, एवं गृह प्रवेश और अन्य सभी तिथियों से संबंधित मामलों में चंद्रमास का ही प्रयोग होता है।

मित्रों ऊपर बताए सभी तरीकों के आधार पर ही कुछ गणित करके हम मुहूर्त का निर्धारण करते हैं, और पंचांग के आधार पर ही शुभ समय का निर्धारण किया जाता है जिससे वास्तव में किस कार्य के लिए कौन सी ऊर्जा किस समय अत्यधिक मात्रा में वातावरण में उपस्थित होती है इसका निर्धारण किया जाता है, इसलिए जीवन में मुहूर्त का अत्यधिक महत्व है और इसका अपना एक स्थान है। ज्योतिष गणना के आधार पर हम वास्तु का भी मुहूर्त करते हैं और इसी गणना के आधार पर हम किसी भी शुभ कार्य का मुहूर्त तय करते हैं।


दोस्तों 24 मिनट की एक घाटी होती है और एक मुहूर्त दो घाटी का होता है, पंचांग के आधार पर हम मुहूर्त को तय करते हैं जिसमें चंद्रमा और सूर्य का सबसे अधिक महत्व होता है। नए घर में प्रवेश हो, शादी विवाह हो या घर का नया निर्माण करने का विचार मन में हो, जमीन जायदाद की खरीदारी हो, विवाह के लिए वर वधू देखने के लिए जाने का समय हो, इन सभी कार्यों के लिए हम मुहूर्त को अत्यधिक महत्व देते हैं। शुभ समय में किया गया कार्य शुभ परिणाम देता है। शुभ समय का अभिप्राय ऊर्जा के उस भाव से होता है जो, हमें हर तरफ से उर्जान्वित करें  जिसके लिए योग, तिथि, करण, नक्षत्र, मास, एवं वार अपना अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन्हीं के आधार पर हम मुहूर्त का निर्धारण करते हैं।

मुहूर्त  के बारे में आपको यह जानकारी कैसी लगी हमें अवश्य बताइए। यदि इसके अलावा भी आपकी कोई जिज्ञासा हो मुहूर्त के बारे में या ज्योतिष के अन्य पहलुओं के बारे में तो हमें अवश्य लिखें, या हमसे संपर्क करें, आप हमें ईमेल के माध्यम से भी संपर्क कर सकते हैं और कांटेक्ट बॉक्स में जाकर मैसेज में लिख कर के संपर्क कर सकते हैं और फोन के माध्यम से भी हमसे संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा मेरा निवेदन है कि आप इस पोस्ट को फेसबुक व्हाट्सएप टि्वटर पर अधिक से अधिक शेयर करें। यदी पोस्ट पसंद आया हो तो सब्सक्राइब जरूर करें और अपना कमेंट अवश्य कमेंट बॉक्स में करें जिससे मुझे मेरे कार्यों में और स्पष्टता लाने में मदद मिलेगी आपके सुझाव मेरे लिए अमूल्य है।


धन्यवाद दोस्तों

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