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ज्योतिष में ग्रहों के महत्व और नक्षत्र

श्री रामचंद्र जी का नाम ऋषि मुनि ने उनके जन्म का नक्षत्र और राशि देख कर रखा था, जैसा कि  रामायण में लिखा है। इससे यह पूर्ण रूप से सिद्ध होता है कि वैदिक काल के समय पुत्र का नाम उसकी राशि के अनुसार रखा जाता था। राशि की जानकारी के लिए नक्षत्र का जानना जरूरी है और यदि नक्षत्र के बारे में जानकारी है तो जन्म कुंडली का आधार भी यही नक्षत्र होते हैं, अत: ब्रह्मांड में  नक्षत्रों का एक जाल सा बना हुआ है, और यदि पृथ्वी से देखा जाए तो हर 2 घंटे में पूर्व दिशा में एक राशि (2.25 नक्षत्र) बदलता है इसी के आधार पर हमारी जन्मकुंडली भी बनती है। और इन्हीं नक्षत्रों के Lord यही ग्रह होता है नक्षत्रों के बारे में विस्तार से हम आगे बात करेंगे। किंतु अभी ज्योतिष और ग्रहों  के महत्व की बात हो रही है तो इसलिए हम इसी पर वापस आते हैं।
 ग्रह और उसके प्रभाव
 हम बात करेंगे कि ग्रह हम पर किस रूप में प्रभाव डालते हैं। तो सबसे पहले ग्रहों के राजा सूर्यदेव आते हैं तो  हम शुरू करते हैं सूर्य से-

Sun-सूर्य ग्रह- ज्योतिष में सूर्य ग्रह को सबसे प्रधान दर्जा प्राप्त है। इन्हें ग्रहों का राजा कहा जाता है। सूर्य को ऊर्जा, पराक्रम, आत्मा, यश, एवं मान-सम्मान और पिता एवं राजा  के रूप में हम पर प्रभाव डालते हैं। जिस व्यक्ति की कुंडली में सूर्य देव की स्थिति प्रबल हो और वह बलाबल के साथ बैठे हो ऐसी स्थिति में जातक को मान सम्मान दिलाते हैं, और सरकारी नौकरी  एवं उच्च पद के लिए भी इन्हीं का सहयोग सबसे ज्यादा होता है। अगर यह अपना प्रभाव पॉजिटिव डालते हैं तो व्यक्ति के अंदर नेतृत्व की क्षमता, गुड मैनेजमेंट विकसित होता है यदि इनका रिजल्ट नेगेटिव हो जाए तो व्यक्ति कार्य तो नेतृत्व का करेगा किंतु मैनेजमेंट उसका हमेशा बिगड़ा ही रहेगा ऐसी स्थिति में यदि वह सूर्य के उपाय करते हैं, तो काफी हद तक उनका बॆड मैनेजमेंट गुड मैनेजमेंट में बदल सकता है।

 Moon-चंद्र ग्रह- ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को रानी का दर्जा प्राप्त है और इन्हें मन, माता, यात्राएं और जल का कारक माना जाता है। वैसे तो देखा जाए वैदिक ज्योतिष में  चंद्रमा के आधार पर ही व्यक्ति की कुंडली या जन्मपत्री का निर्माण होता है। चंद्रमा जिस नक्षत्र में बैठते हैं ऊंसी नक्षत्र के स्वामी की दशा जातक को प्राप्त होती है और उस जातक की राशि भी वही होती है जिस राशि में चंद्रमा बैठते हैं, इसलिए चंद्रमा को सबसे ज्यादा विशेष दर्जा प्राप्त है। जिस जातक के जन्मकुंडली में चंद्रमा शुभ स्थिति में बैठे हो उस जातक के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके प्रभाव से जातक के मानसिक स्थिति का पता चलता है और उसकी मनोदशा अच्छी होने से उसका जीवन भी अच्छे कार्यों में ही लगता है। और यदि चंद्रमा कमजोर हो पीड़ित हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति हमेशा मानसिक तनाव और कल्पना शक्ति के खराब होने की वजह से किसी भी कार्य को सुचारु रुप से करने में असफल रहेगा।

Mars-मंगल ग्रह- शास्त्र में मंगल ग्रह को शक्ति, साहस, पराक्रम, सेना, उत्तेजना, छोटे भाई, शस्त्र और क्रोध  के लिए जाना जाता है। इसके अलावा भूमि, अचल संपत्ति, पुलिस इनके भी कारक मंगल ही होते हैं पुराणों में लिखा है कि मनुष्य के नेत्रों में मंगल ग्रह का वास होता है। यदि किसी व्यक्ति के मंगल शुभ हो तो व्यक्ति निडर, साहसी होगा और किसी भी युद्ध में विजय होने की संभावना बढ़ जाती है। किंतु यदि जातक की जन्मकुंडली में मंगल अशुभ स्थिति में बैठे हो तो जातक दिखेगा साहसी किंतु होगा डरपोक, छोटी-छोटी बातों से क्रोधित हो जाएगा और लड़ाई झगड़ा करने लगेगा। ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को क्र् र ग्रह का दर्जा प्राप्त है शरीर में ऊर्जा का कारक मंगल ग्रह ही है।


 Mercury-बुध ग्रह- बुध ग्रह हमारी बुद्धि का, हमारी वाणी का, तर्क शक्ति का, गणित, संचार, मामा और चतुर का परिचय देते हैं। ग्रहों के मंत्रिमंडल में इनका स्थान राजकुमार का है। बुध ग्रह नपुंसक ग्रह हैं, बुध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं, लग्न में दिगबली होते हैं। शरद ऋतु का स्वामी तथा दिन व रात्रि दोनों में बली रहते हैं। यह त्वचा के कारक है। पाप प्रभावित होने पर त्वचा के रोग देते हैं। यदि कुंडली में बुध की स्थिति कमजोर हो तो जातक की गणित, कैलकुलेशन, तर्क शक्ति बुद्धि संवाद इन सभी चीजों में उसे समस्या का सामना करना पड़ता है जब की स्थिति मजबूत हो तो इन्हीं क्षेत्रों में बहुत अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं बुध ग्रह का प्रिय रंग हरा है।


Jupiter-बृहस्पति ग्रह- बृहस्पति ग्रह को ज्योतिष में गुरु का दर्जा प्राप्त है। इसलिए शिक्षा, अध्यापक, धर्म, बड़े भाई, दान, परोपकार, संतान, आदि का कारक गुरु को माना जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में गुरु की स्थिति खराब हो वह व्यक्ति ज्ञान के क्षेत्र में पीछे रह जाता है। और जिसके गुरु अच्छे हो वह व्यक्ति ज्ञानी विद्वान बनता है। और व्यक्ति का स्वभाव भी धार्मिक होता है। नौ ग्रहों में सबसे नैसर्गिक व शुभ ग्रह गुरु ही है ,इसलिए गुरु की दृष्टि जिस भी ग्रह पर पड़ जाए वह खराब होते हुए भी अपने फल में परिवर्तन करता है और जातक को अच्छे फल देता है। कुंडली में यदि गुरु लग्न में बैठ जाएं तो सवा लाख दोषों को दूर करते हैं, बृहस्पति की दृष्टि जिस भाव पर भी पड़ जाए उस भाव में शुभ फलों की वृद्धि हो जाती है। बृहस्पति का रंग पीला है, एवं रत्न पुखराज है।


 Venus-शुक्र ग्रह- शुक्र ग्रह एक चमकीले ग्रह है, विवाह, प्रेम, सौंदर्य, रोमांस, कामवासना, भौतिक सुख-सुविधा, संगीत, फैशन, कला, डिजाइन, इन सभी के कारक होते हैं। वीर्य के कारक भी शुक्रदेव ही हैं। शुक्र ग्रह को मंत्रिमंडल में मंत्री का पद प्राप्त है ब्राह्मण वर्ण के, स्त्री ग्रह, जलीय तत्व, तथा राजसिक ग्रह है। शुक्र देव यह एक नैसर्गिक शुभ ग्रह है। शुक्र की बात व कफ प्रकृति है, शुक्र का निवास स्थान शयनकक्ष है, यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र की स्थिति मजबूत हो तो जातक के जीवन में भौतिक एवं शारीरिक सुख सुविधाओं का सुख प्राप्त होता है। यदि व्यक्ति विवाहित है तो उसका  वैवाहिक जीवन भी सुखी रहता है। शुक्र का रंग गुलाबी होता है, और इनका रत्न हीरा है।

Saturn-शनि ग्रह- ज्योतिष शास्त्र में शनि ग्रह को पापी ग्रह का दर्जा प्राप्त है। इनकी चाल सबसे धीमी है, अतः सभी ग्रहों में इनके गोचर की अवधि ढाई वर्ष की होती है। एक भाव में ढाई वर्ष होने की वजह से यदि यह व्यक्ति की कुंडली में खराब स्थिति में हो तो गोचर के समय में व्यक्ति को तकलीफ भी ज्यादा होती है, चाल धीमी होने की वजह से यह अपना प्रभाव धीमी गति से देते हैं और देर तक देते हैं। काल पुरुष की कुंडली में शनि आयु कारक होते हैं। किंतु दुख, कष्ट, रोग, पीड़ा, विज्ञान, तकनीकी, लोहा, खनिज तेल, कर्मचारी, सेवक, जेल, आदि का कारक माने जाते हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में शनि दोष हो तो इन क्षेत्रो में उन्हें हानि का सामना करना पड़ता है। शनि के शरीर का रंग काला है, अंग बड़े हैं, तथा बाल कठोर रखे हैं, दांत नाखून देखने में भयानक वह मोटे हैं, यह एक तामसिक ग्रह है, आलसी शूद्र तथा निराशा का प्रतीक है, शनि पश्चिम दिशा के स्वामी है, कसैले रस पर इनका आधिपत्य है, इनका रत्न नीलम है।


Rahu-राहु ग्रह- राहु ग्रह एक छाया ग्रह हैं वास्तव में इनका कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए इन्हें किसी भी राशि का स्वामी नहीं माना जाता मूल रूप से राहु सर्प का मुख कहे जाते हैं, यह  नीली आभा लिए हुए होते हैं। ज्योतिष शास्त्र में राहु को कठोर वाणी, जुआ, चोरी, धृष्टता, विदेश यात्रा, त्वचा के रोग, आदि का कारक माना जाता है यदि जिस व्यक्ति की कुंडली में राहु अशुभ हो तो उन्हें अनेक समस्याएं एवं पीड़ा ए देते हैं। यदि इनकी चाल की बात की जाए तो यह उल्टी चाल से चलते हैं। इनका बैर सूर्य और चंद्रमा दोनों से है, इसलिए  कुंडली में यदि सूर्य या चंद्रमा के साथ बैठे तो यह बहुत अशुभ होता है इसे ग्रहण का रूप कहा जाता है। राहुल को 2 विशेष गुण मिले हैं पहला यह फल जो भी देते हैं वह अचानक से देते हैं चाहे शुभ हो या अशुभ, दूसरा विस्फोट करना, राहु बहुत तीव्रता के साथ शुभ या अशुभ फल देते हैं। शनि वत राहु यह एक कहावत है शनि अंधेरा है तो राहु अंधकार है शनि दुख है तो राहु दुख का समंदर है।

 Ketu-केतु ग्रह- केतु ग्रह को भी ज्योतिष में छाया ग्रह का दर्जा प्राप्त है इसलिए इन्हें भी किसी राशि का स्वामी नहीं माना जाता है। केतु का रंग धोने जैसा है केतु को तंत्र-मंत्र, जादू टोना, घाव और पीड़ा का कारक माना गया है। यदि व्यक्ति की जन्मपत्री में केतु शुभ स्थान पर शुभ ग्रहों के साथ बैठे हो तो यह जातक के व्यक्तित्व को उसकी स्थिति को परिस्थिति को ऊंचा उठाने में मदद करते हैं और यदि यह खराब भाव में या खराब ग्रह के साथ बैठे हैं तो यह पापी ग्रह होने की वजह से व्यक्ति को पाप प्रभाव में ले आते हैं। और व्यक्ति तंत्र मंत्र  के चक्रों में पड़कर अपना जीवन नर्क जैसा बना लेता है।

 दोस्तों यहां पर हमने विस्तार से नौ ग्रहों के बारे में जाना और समझा यह नवग्रह हमारे जीवन को चलाने में एक्शन और रिफ्लेक्शन की पद्धति से कार्य करते हैं इनकी एनर्जी से हमारे शरीर में सूक्ष्म बदलाव होते रहते हैं जो ग्रह हमारे  जन्म कुंडली में शुभ है वह हमें पॉजिटिव एनर्जी देते हैं और जो ग्रह हमारी जन्म कुंडली में  अशुभ है वह हमें नेगेटिव एनर्जी देते हैं। इन्हीं पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी को यदि हम बैलेंस कर ले तो हम किसी भी ग्रह से अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। एनर्जी के बारे में और ज्यादा जानकारी के लिए हम आगे फिर कभी बात करेंगे।

दोस्तों आपने देखा ग्रह और उनके प्रभाव हमें किस प्रकार से प्रभावित करते हैं उम्मीद करता हूं कि आप को जानकारी देने में मैं सफल हुआ हूं। यदि कोई त्रुटि रह गई हो तो उसे क्षमा करिए, और यदि आपके कोई सुझाव हो तो हमें Contact बॉक्स में जाकर अवश्य दे आपके सुझाव हमारे लिए अमूल्य है  धन्यवाद

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Astro Vastu Sarvesh (AVS) का उद्देश्य लगो की जनम कुंडली से निकलने वाली ऊर्जा और उस व्यक्ति के मकान से निकलने वाली ऊर्जा के बीच तालमेल बैठाना ही है, ताकि वो व्यक्ति मकान के बजाय "सुख और समृद्ध घर" मे रहे। इंसान के सोच से कर्म का निर्माण होता है, और कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है, AVS आपके कर्म को जागृत करते है और आप अपने भाग्य को।

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